प्राचीन श्री हनुमान मंदिर, हांसी में पितृ पूजा
सनातन धर्म में पितृ पूजा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे शास्त्रों में उल्लेख है कि पितरों की कृपा से ही
वंश की उन्नति, सुख-समृद्धि एवं पारिवारिक शांति बनी रहती है। पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए पितरों का
स्मरण, पूजन, तर्पण एवं दान करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
बिंदल परिवार में पितृ पूजा की एक विशेष, अनूठी एवं श्रद्धा से परिपूर्ण परंपरा प्रचलित है। परिवार में यदि
किसी पुरुष सदस्य का देहांत हो जाता है, तो उनके नाम की चंदन की लकड़ी से एक पाटी बनवाई जाती है,
जिस पर उस दिवंगत सदस्य का नाम अंकित किया जाता है। यह चंदन पाटी उस आत्मा को पितृ रूप में पूजने
हेतु तैयार की जाती है। इसी परंपरा के अंतर्गत बिंदल परिवार में पितृ पूजन का विशेष आयोजन किया जाता
है।
परिवार में जब भी कोई बड़ा शुभ कार्य होता है—जैसे विवाह, बच्चे का प्रोजन्न (जन्म से संबंधित संस्कार), या
कन्या के कान छेदन का संस्कार—तो परिवार के सदस्य इन पितृ चंदन पाटियों को अपने घर ले जाते हैं और
पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ उनकी पूजा करते हैं। कार्य संपन्न होने के पश्चात, विधिवत पूजन के बाद इन
पाटियों को पुनः मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है।
मंदिर परिसर में पितरों के लिए एक अलग एवं पवित्र स्थान निर्धारित किया गया है, जहाँ सभी पितरों के
पूज्य स्वरूप विधिवत रूप से स्थापित हैं। प्रत्येक वर्ष कनागत (पितृ पक्ष) के महीने में आने वाली अमावस्या के दिन बिंदल परिवार के अनेक सदस्य
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर में एकत्रित होते हैं और अत्यंत श्रद्धा भाव से पितृ पूजा संपन्न करते हैं। इस अवसर
पर सभी पितृ स्वरूपों का पंचामृत से स्नान कराया जाता है, विधिपूर्वक हवन-पूजन किया जाता है तथा
ग्यारह या इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। साथ ही ब्राह्मणों को वस्त्र एवं दान-दक्षिणा भी प्रदान
की जाती है।
पितृ पूजा – झलकियाँ

















